Thursday, April 5, 2018

जय OPS

पेंशन बहाली तो हमारे हक समान है,
इसको पाने में लोगों ने दी अपनी जान है।

ताउम्र समर्पण के बाद हक हम ये पाते हैं,
फिर भी इसको न देने में रोज़ नए बहाने हैं।

सीमित संसाधनों की बात हमने मानी है,
पर नेताओं के लिए, ये बात क्यों बेमानी है?

भारतीय संविधान की,गरिमा का बलिदान है,
नेताओं के फायदे में ही,बस सब कुछ कुर्बान है ।

हक को पाने में देनी पड़ती कुर्बानी है,
इतिहास के पन्नो ने भी यह बात मानी है ।

रात्रि के अंधेरे के बाद ही आता उजाला है,
उठो, जागो,आगे बढ़ो ये हक हमने पाना है ।

-भड़ोल





Saturday, March 24, 2018

फलसफा

ज़िन्दगी का फलसफा ढूंढ रहा हूँ,
मैं अब तक मंज़िल को ढूंढ रहा हूँ ।

राह में मिले साहिल जो अब तलक,
उन साहिलों को आज मैं ढूंढ रहा हूँ ।

कितने ही हमसफ़र थे उमंगई राह में,
उस हमसफ़र को आज मैं ढूंढ रहा हूँ ।

खाई थी जिसने कसमें यारी निभाने की,
उन यारों को आज मैं ढूंढ रहा हूँ ।

हर एक आह पर जो बन गए बधिर,
उन बधिरों को आज मैं ढूंढ रहा हूँ ।

मैं थक चुका हूँ पर अबतलक,
पर मंज़िल को ढूंढ रहा हूँ ।

-भड़ोल

मंज़िल

जी चाहता है झूम लूँ, हर ग़म को भूल लूँ ।
ज़िन्दगी की राह में, हर मुकाम चूम लूँ ।

आसां नहीं है राह ये,हर मोड़ पर अंजान हैं,
मंज़िल पाने का पथ ये अब नहीं आसान है।

होश में आया मैं, जब मिले वो पथिक मुझे,
खून पसीने से तर बतर, उस राह पर वो अग्रसर ।

उठना अगर मैं सीख लूँ, झुकना अगर मैं सीख लूँ,
ज़िन्दगी की हर राह पर, रोज़ नई मैं सीख लूँ ।

मुश्किल है सफर और राह भी अनजान है,
मिल ही जाएगी वो डगर जिस राह पर भगवान हैं ।

अरमां लिए इस दिल में कुछ करने की ठान है,
नेक बंदों के लिए कुछ करने का अरमान है ।

फड़फड़ा के एक न एक दिन मंजिल पा ही लूंगा मैं,
हौंसला हो न हो पर, पार पा ही लूंगा मैं।

-भड़ोल




ईमान

कोई हनी कोई मनी के ट्रैप में फसा है,
नीरव के हाथ में माल मोटा लगा है ।

माल्या भी मोटा चूना लगा गया है,
पिसने के लिए आम आदमी खड़ा है ।

ड्रैगन से देश को खतरा बढा है,
पाक का ईमान रोज़ ही ढला है ।

कमाने का ढंग भी, बदल सा गया है,
मेहनत वालों को कहते अब 'गधा' है।

ईमान की नस्ल अब, लुप्त हो रही है ।
मोटी मोटी डीलें, अब गुप्त हो रही हैं ।

-भड़ोल

नमन

जलने वालों को नमन है, हौंसला वो देते हैं,
आगे बढ़ने के लिए, एक वजह सी देते हैं ।

पीठ पीछे चुगलियों का, मज़ा वो लेते हैं,
सामने आते ही वो ,झट पलट लेते हैं ।

जब हो जाए चुगली बेकार, फिर जात सामने आती है,
एक न एक दिन, कमीनों की औकात सामने आती है।

भूल जाते हैं अक्सर ज़िन्दगी की सच्चाई,
खाना पड़ता है वही जिसकी की हो बुआई ।

सच का रंग अब फीका सा होता जा रहा है,
हंस को छोड़ के कौआ ही मोती खा रहा है।

बुरे वक्त में जीने की कला तुम सीख लो,
बीत जाएंगे वो भी दिन, इस बात से तुम सीख लो।

-भड़ोल








पड़ोसी

सीज़फायर वायलेशन अब आम हो गई है,
पाकिस्तान की जुर्रत शरेआम हो गई है ।

घर में नही निवाला और खीर चाहते हैं,
पख्तून नहीं सम्भलता और कश्मीर चाहते हैं?

कई बार मुहँ की खाई पर चैन न है आई,
बेशर्मी की हदों को भी पार कर चुके हैं ।

रोज़ हैं नया एक बाप ढूंढते रहते,
अब तलक है अपनी औकात ढूंढते रहते ।

न्यूक्लिअर पावर की धौंस है जमाता,
चीन के आगे, है रोज़ गिड़गिड़ाता ।

हिल चुका है अब तक, कई बार मुहँ की खाकर,
पर अक्ल न है आयी, नाक भी कटवा कर ।

दूसरों के पल्लू में कब तलक छुपोगे,
हम भड़क गए तो नज़र नहीं आओगे ।

-भड़ोल

भेड़िये

दोपहर की धूप में देखा उसे चलते हुए,
राह चलते भेडियों की आंख से बचते हुए।

सहमी सहमी चल रही भीड़ से छुपते हुए,
सोचती सी जा रही थी मन ही मन कुढ़ते हुए।

नारी को विवश है देखा हर तरफ संसार में,
किस-2 को जवाब दे वो इस कुटिल संसार में।

हाँ वो मां है, हाँ वो बेटी, इस पुलकित संसार में,
अग्निपरिक्षा देते आई है वो अनन्त काल से ।

विचित्र रूप हैं देखें उसने, परम पुरुषार्थ के,
कभी देविय रूप में, कभी चांडालिय अवतार में।

सोचती है कचोटती है, हर आह पर वो सोचती है,
भेज कर धरती पे प्रभु ने, क्या कोई उपकार किया?

समाज की बेड़ियों से, अब उसे तुम मुक्ति दो,
या जन्म लेने से पहले, कोख में ही मार दो ।

- भड़ोल